साल 2016 की सर्दियों की बात है। शाम के 7 बज रहे थे और घर में सन्नाटा तो था, लेकिन तनाव (tension) उससे कहीं ज्यादा।
वजह थी मेरी ज़िद। मुझे मैथ्स की ट्यूशन लगानी थी। मेरे दोस्त ने जिस सर का नाम बताया था, वो शहर के बेस्ट टीचर थे, लेकिन उनकी क्लास देर शाम को होती थी।
हॉल में पापा सोफे पर बैठे थे, चेहरे पर वही पुरानी चिंता। मैंने हिम्मत करके पूछा, “पापा, क्या मैं वो क्लास ज्वाइन कर लूं?”
पापा ने अखबार नीचे रखा और बिना मेरी तरफ देखे कहा, “नहीं। टाइम देखा है? अंधेरा हो जाता है। और हमारे शहर का हाल तुम्हें पता है। लड़कियों के लिए कोई सेफ ट्रांसपोर्ट नहीं है। ना तुम्हारे पास स्कूटी है, ना मैं रोज़ छोड़ने जा सकता हूँ। बात खत्म।”
मेरा दिल बैठ गया। यह ‘ना’ सिर्फ एक क्लास के लिए नहीं था, यह मेरी हिम्मत तोड़ने जैसा था।
तभी भैया कमरे से बाहर आए। शायद वो दरवाज़े के पीछे सब सुन रहे थे। पापा और भैया के बीच अक्सर बहस नहीं होती थी, लेकिन उस दिन भैया का चेहरा तमतमाया हुआ था।
“पापा, कब तक?” भैया ने ज़ोर से पूछा।
“क्या कब तक?” पापा ने चश्मा उतारते हुए कहा।
“यही डर। अगर आज नहीं गई तो कभी नहीं जा पायेगी।”
बहस बढ़ती गई। पापा अपनी सुरक्षा की दलीलें दे रहे थे और भैया मेरी आज़ादी की। और फिर, भैया ने वो बात कही जो आज भी मेरे कानों में गूंजती है। उन्होंने मेरी तरफ इशारा किया और पापा की आँखों में देख कर कहा:
इसे कमरे में बंद कर दो!, भाई के उस एक वाक्य ने कैसे मेरी दुनिया बदल दी
“रूम में बंद करके रख दीजिये इसको! क्या ज़रुरत है दुनिया देखने और समझने की? लेकिन याद रखिये जब भी बाहर निकलेगी, इसको 100 गुना ज्यादा मुश्किल होगी हमारी वजह से! कल से ये ट्यूशन जा रही है और कोई नहीं रोकेगा। ये डेली ट्रेवल करेगी, और खुद सीखेगी कि दुनिया से कैसे डील करते हैं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। पापा चुप हो गए। शायद भैया की कड़वी सच्चाई ने उनके डर को हरा दिया था। अगले दिन से, मैं ट्यूशन जाने लगी। डर मुझे भी लगता था, अंधेरे रास्तों पर अकेले चलते हुए दिल ज़ोर से धड़कता था, लेकिन उस दिन मैंने सिर्फ मैथ्स नहीं सीखी, मैंने ‘चलना’ सीखा।
वक्त का पहिया घूमा। 12वीं के बाद कॉलेज के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा। फिर नौकरी के लिए और दूर।
आज 10 साल हो गए हैं।
मैं अब अपनी कार खुद चलाकर ऑफिस जाती हूँ। हाईवे पर जब मैं स्टीयरिंग व्हील थामती हूँ, तो मुझे वो डरी हुई लड़की याद भी नहीं आती जो घर की चौखट पार करने से घबराती थी। मेरे पड़ोसी आज अपनी बेटियों को मेरा उदाहरण देते हैं।
मुझे लगा था मैंने ज़िंदगी का सबसे बड़ा पाठ सीख लिया है—’आत्मनिर्भर’ (Independent) होना। लेकिन मैं गलत थी। असली इम्तिहान अभी बाकी था।
ढाई साल पहले मेरी ज़िंदगी में एक शख्स आया। प्यार हुआ, और अब हम शादी करने वाले हैं।
शुरुआत में सब अच्छा था। लेकिन धीरे-धीरे, मुझे अजीब सी बेचैनी होने लगी। जब वो अपने दोस्तों के साथ बाहर जाता, या देर रात तक काम करता, तो मैं परेशान हो जाती।

मैं उसे बार-बार कॉल करती। “कहाँ हो? कब आओगे? किसके साथ हो?” मैं उसे वो सब करने से रोकने लगी जो उसे पसंद था।
एक दिन हम दोनों बैठे थे, और वो बहुत शांत था। उसकी चुप्पी मुझे चुभ रही थी। मुझे अचानक एहसास हुआ—मैं क्या कर रही हूँ?
मैं बिल्कुल अपने पापा जैसी बन गई थी।
फर्क सिर्फ इतना था कि पापा ‘सुरक्षा’ के नाम पर डरे हुए थे, और मैं ‘खोने’ के डर से। मैं प्यार के नाम पर उसे कण्ट्रोल कर रही थी। मैं उसे बांध रही थी, ठीक वैसे ही जैसे मुझे बांधने की कोशिश की गई थी।
उस रात मुझे भैया की बात फिर याद आई। “रूम में बंद करके रख दीजिये इसको…” क्या मैं वही नहीं कर रही थी? उसकी आत्मा को, उसकी खुशियों को एक कमरे में बंद कर रही थी?
मुझे समझ आ गया कि प्यार का मतलब किसी को मुट्ठी में भींचना नहीं, बल्कि हथेली खोलकर उसे आसमान देना है।
हम अपनी माँ को रोकते हैं क्योंकि “समाज क्या कहेगा?” हम पिता को रोकते हैं, भाई-बहनों को रोकते हैं, पार्टनर को रोकते हैं। हमें लगता है हम उन्हें बचा रहे हैं, लेकिन असल में हम उन्हें अपनी कमज़ोरियों का गुलाम बना रहे हैं।
उस दिन मैंने उसे ‘फ्री’ छोड़ दिया। “तुम्हें जो करना है करो, मुझे तुम पर भरोसा है,” मैंने उससे कहा।
यकीन मानिए, जैसे ही मैंने उसे आज़ाद किया, मुझे खुद आज़ादी महसूस हुई। मेरे सीने से एक भारी बोझ उतर गया। वो खुश था, और उसे खुश देखकर मैं और ज्यादा खुश थी।
अगर आप किसी नदी को समंदर में मिलने से रोकेंगे, तो बाढ़ ही आएगी। आज मैं समझ गई हूँ—भगवान ने हमें लोगों से प्यार करने का हक़ दिया है, उन्हें कण्ट्रोल करने का नहीं।
सीख: पिंजरा सोने का हो या लोहे का, पंख काटने का काम दोनों बखूबी करते हैं। अपने अपनों को उड़ने दीजिये, वे लौटकर आप ही के पास आएंगे।
दिल्ली का वह अधूरा वादा: उम्मीद, इंतज़ार और सच्चाई। Hindi Love Story.


Nice thinking about love❤
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