जिंदगी की रेस
Hindi Love Story: रोहन का हाथ बस के लोहे के हैंडल पर कस गया था। उसकी उंगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं और चेहरे पर नसों का जाल उभर आया था। बस की रफ़्तार धीमी थी, और वह दौड़ते हुए बस के पायदान पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था। उसकी आँखें सीधे सुमन पर गड़ी थीं किसी शिकारी की तरह, जिसने अपने शिकार को भागते देख लिया हो।
“रुको! मेरी बीवी है वो! बस रोक सा$!” रोहन ने ड्राइवर की खिड़की की तरफ चिल्लाते हुए गाली दी।
सुमन की सांस हलक में अटक गई। वह सीट के नीचे लगभग सिकुड़ गई थी, थर-थर कांप रही थी। बस के अंदर बैठी सवारियां तमाशबीन बनी हुई थीं। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि बाहर क्या हो रहा है। यही दिल्ली थी, जहाँ चीखें भी शोर में दब जाती हैं।
रोहन ने एक पैर बस के पायदान पर रखा और ऊपर चढ़ने के लिए जोर लगाया। सुमन ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसे लगा अब सब खत्म। रोहन उसे बालों से पकड़कर नीचे घसीट लेगा और फिर…
तभी, बस के दरवाजे पर खड़े कंडक्टर ने, जो एक भारी-भरकम आदमी था, रोहन को धक्का दिया। “ओए! क्या कर रहा है? मरने का शौक है क्या?” कंडक्टर ने अपनी खैनी थूकते हुए चिल्लाया। “टिकट नहीं लेना तो नीचे उतर! गुंडागर्दी नहीं चलेगी यहाँ।”
उसी पल, ट्रैफिक सिग्नल हरा हो गया। बस के ड्राइवर ने गियर बदला और एक्सीलेटर पर पैर दबा दिया। बस एक झटके के साथ आगे बढ़ी।
रोहन का संतुलन बिगड़ा। कंडक्टर के धक्के और बस की अचानक रफ़्तार ने उसे सड़क पर पटक दिया। वह लुढ़कते हुए डिवाइडर से जा टकराया।
सुमन ने खिड़की के कांच से पीछे मुड़कर देखा। रोहन धूल झाड़ते हुए खड़ा हो रहा था। वह बस के पीछे नहीं दौड़ रहा था, लेकिन वह अपनी जगह खड़ा होकर उसे घूर रहा था। उसने अपना फोन निकाला और नंबर मिलाने लगा। सुमन समझ गई—वह हार नहीं मान रहा। वह अपने ‘दोस्तों’ को खबर कर रहा है या शायद किसी और को जो बस के अगले स्टॉप पर हो।
बस अब रफ़्तार पकड़ चुकी थी। दिल्ली की रंग-बिरंगी रोशनी, बड़ी-बड़ी इमारतें और चमकते होर्डिंग्स खिड़की के बाहर से गुजर रहे थे, लेकिन सुमन को उनमें सिर्फ अंधेरा दिखाई दे रहा था।
“किधर जाना है?” कंडक्टर की भारी आवाज ने सुमन को चौंका दिया। वह उसके सामने खड़ा था, हाथ में टिकट मशीन लिए।
सुमन हड़बड़ा गई। उसने सलमा का दिया हुआ 500 का नोट आगे बढ़ा दिया। उसका गला इतना सूख गया था कि आवाज ही नहीं निकल रही थी। “आ… आनंद विहार,” उसने बस स्टैंड का नाम लिया जो उसने गाँव में लोगों से सुना था कि वहां से बिहार-झारखंड की बसें मिलती हैं।
“आनंद विहार अभी दूर है। बैठ जाओ,” कंडक्टर ने टिकट फाड़कर दिया और बाकी पैसे वापस किए।
सुमन ने शॉल से अपना चेहरा और अच्छी तरह ढक लिया। उसे हर सवारी पर शक हो रहा था। क्या सामने बैठा वह आदमी रोहन को जानता है? क्या वह लड़का जो फोन पर बात कर रहा है, रोहन को बता रहा है? उसका डर उसे पागल कर रहा था।
करीब एक घंटे बाद, बस ‘आनंद विहार’ बस अड्डे (ISBT) के पास रुकी। यहाँ का नजारा और भी भयावह था। हजारों लोग, सैकड़ों बसें, रिक्शे वालों की चीख-पुकार और कुलियों का शोर।
सुमन बस से उतरी। उसके पैर कांप रहे थे। वह भीड़ में खो जाना चाहती थी, ताकि कोई उसे ढूँढ न सके। लेकिन अब उसके सामने एक और पहाड़ खड़ा था—जाए तो जाए कहाँ?
एक नए सफर की ओर

अगर वह घर जाती है, तो रोहन ने धमकी दी थी कि वह पुलिस को चोरी की झूठी कहानी बताकर उसके माँ-बाप को फंसा देगा। और वैसे भी, रोहन को उसका गाँव, उसका घर पता है। अगर वह गाँव गई, तो रोहन वहां भी पहुँच सकता है और पूरे गाँव में उसे बदनाम कर सकता है। गाँव वाले रोहन जैसे शहरी बाबू की बात मानेंगे या सुमन की? यह सोचकर ही उसकी रूह कांप गई।
वह घर नहीं जा सकती थी। और दिल्ली में रुकना मौत को दावत देना जैसे था।
सुमन एक खंभे के पीछे छिपकर खड़ी हो गई। उसकी नजरें बस अड्डे के गेट पर थीं। तभी उसने देखा—दो लड़के, जो हुलिए से ही बदमाश लग रहे थे, हर आने-जाने वाली लड़की को घूर रहे थे। उनमें से एक के हाथ में फोन था और वह बार-बार स्क्रीन देखकर इधर-उधर देख रहा था। क्या रोहन ने सुमन की फोटो उन्हें भेज दी थी?
सुमन का दिल जोर से धड़का। सलमा ने कहा था – “यह शहर भेड़ियों का है।”
उसे तुरंत फैसला लेना था। पास ही एक बस खड़ी थी जिसके कंडक्टर चिल्ला रहे थे— “जयपुर! जयपुर! बस खुलने वाली है!”
जयपुर? सुमन को नहीं पता था कि जयपुर कहाँ है, कितनी दूर है। लेकिन उसे इतना पता था कि यह बस दिल्ली से बाहर जा रही है। और इस वक्त, दिल्ली से बाहर जाने वाली हर दिशा उसके लिए स्वर्ग का रास्ता थी।
उसने अपनी मुट्ठी में बचे हुए पैसे भींचे। क्या इतने पैसों में वह जयपुर पहुँच पाएगी? और वहां जाकर क्या करेगी? वहां तो वह सलमा को भी नहीं जानती।
लेकिन वह दो लड़के अब उसकी तरफ बढ़ रहे थे। शायद उन्होंने उसे देख लिया था। अब सोचने का वक्त नहीं था।
सुमन ने एक गहरी सांस ली, भगवान को याद किया, और जयपुर जाने वाली बस की तरफ दौड़ लगा दी। बस धीरे-धीरे रेंगने लगी थी। वह चलती बस के दरवाजे पर लपकी और अंदर घुस गई।
बस ने रफ़्तार पकड़ी और दिल्ली की सीमा की ओर बढ़ने लगी। सुमन ने राहत की सांस ली, लेकिन यह राहत अधूरी थी। वह एक जाल से निकलकर दूसरे अनजान कुएं की तरफ बढ़ रही थी।
सीट पर बैठते ही उसे अपनी माँ का चेहरा याद आया और उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। 19 साल की उम्र, जेब में चंद सौ रुपये, न कोई पहचान, न कोई ठिकाना।
तभी, उसके बगल वाली सीट पर बैठी एक बूढ़ी अम्मा ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “क्या हुआ बिटिया? रो क्यों रही है? घर छोड़कर भागी है क्या?”
सुमन सिहर उठी। क्या यह बूढ़ी औरत उसका सच जान गई? या यह भी कोई नई मुसीबत है? सुमन ने घबराकर उनकी तरफ देखा। बूढ़ी अम्मा की आँखों में अनुभव था, लेकिन क्या उनमें दया थी या छल?
(कहानी अभी बाकी है…शेष कहानी अगले अंक में जारी)
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कहानी दिलचस्प मोड़ ले रही है😊