पिंजरे से पहली उड़ान
Hindi Love Story: सुमन के हाथों में वह पर्ची किसी अंगारे की तरह जल रही थी। “रोहन वो नहीं है जो तू समझती है…” इन शब्दों ने उसके बचे-खुचे विश्वास की धज्जियां उड़ा दी थीं। उसने घबराकर पर्ची को अपनी मुट्ठी में भींच लिया और दरवाजे की ओर देखा। बाहर सीढ़ियों पर सन्नाटा था, लेकिन यह सन्नाटा किसी तूफान से पहले का था।
कमरे में एक पुरानी घड़ी टंगी थी, जिसकी ‘टिक-टिक’ सुमन के दिमाग पर हथौड़े की तरह बज रही थी। दोपहर के 3 बज चुके थे। रोहन ने कहा था कि वह शाम को आएगा। उसके पास शायद दो या तीन घंटे थे।
सुमन ने आंसुओं को पोंछा। रोने का वक्त अब जा चुका था। उसने कमरे का मुआयना करना शुरू किया। दरवाजा लोहे का था और बाहर से बंद था—उसे तोड़ने का सवाल ही नहीं उठता था। उसकी नजर उस छोटी सी खिड़की पर गई जो कमरे के पीछे की ओर खुलती थी। वह दौड़कर वहां गई। खिड़की पर लोहे की जाली लगी थी, लेकिन वह पुरानी और जंग खाई हुई लग रही थी।
उसने नीचे झांका। तीसरी मंजिल की ऊंचाई से नीचे की गली किसी पाताल जैसी दिख रही थी। वहां कूड़े का ढेर था और सूअर घूम रहे थे। अगर वह कूदी, तो हड्डियाँ टूटना तय था। लेकिन अगर वह यहाँ रही, तो उसकी आत्मा टूट जाएगी।
तभी, उसे खिड़की के पास वाली दीवार से ‘खट-खट’ की आवाज सुनाई दी। सुमन का दिल उछलकर गले में आ गया। उसने डरते-डरते जाली के पास जाकर देखा।
बगल वाली इमारत की बालकनी, जो इस कमरे की खिड़की से बमुश्किल तीन फीट की दूरी पर थी, वहां एक औरत खड़ी थी। उसकी उम्र करीब 35-40 साल रही होगी, चेहरे पर झुर्रियां और आँखों में एक गहरा डर। उसने अपने होंठों पर उंगली रखकर सुमन को चुप रहने का इशारा किया।
“ए लड़की,” वह औरत फुसफुसाते हुए बोली, उसकी आवाज में जल्दबाजी थी, “वह पर्ची मैंने ही फेंकी थी। अगर अपनी जिंदगी बचानी है, तो इस जाली को धक्का दे। इसका नीचे वाला पेंच मैंने हफ़्तों पहले ढीला कर दिया था… जब पिछली लड़की यहाँ थी।”
“पिछली लड़की?” सुमन के रोंगटे खड़े हो गए।
“बातें बाद में,” औरत ने डांटा, “रोहन कभी भी आ सकता है। वह आज जल्दी आने वाला है, मैंने उसे नीचे पान की दुकान पर देखा है। जल्दी कर!”
सुमन के अंदर बिजली सी दौड़ गई। रोहन नीचे है? मतलब किसी भी पल वह सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आ सकता है। सुमन ने पूरी ताकत लगाकर जंग लगी जाली के निचले हिस्से पर पैर से वार किया। एक बार, दो बार… जाली नहीं हिली। उसकी आँखों से बेबसी के आंसू बहने लगे।
“हिम्मत मत हार,” औरत ने धीरे से कहा, लेकिन उसकी आँखों में भी घबराहट थी।
सुमन ने अपने पिताजी और बीमार माँ का चेहरा याद किया। क्या वह उन्हें यह खबर देने के लिए जिंदा बचेगी कि उनकी बेटी मर गई या बर्बाद हो गई? नहीं! उसने अपने अंदर की सारी नफरत और ताकत बटोरी और पूरी जान लगाकर जाली पर दोनों पैरों से प्रहार किया।
‘कडक!’ की आवाज के साथ जाली का एक कोना दीवार से उखड़ गया। थोड़ी और मशक्कत के बाद इतनी जगह बन गई कि कोई दुबला-पतला इंसान वहां से निकल सके।
आखिर जाउंगी कहाँ
अब असली चुनौती थी। उसे खिड़की से निकलकर उस तीन फीट की दूरी को पार करके दूसरी बालकनी में कूदना था। नीचे पक्की सड़क मुंह बाये खड़ी थी। एक चूक, और सब खत्म।
“मेरा हाथ पकड़,” उस औरत ने बालकनी से अपना हाथ आगे बढ़ाया।
सुमन खिड़की की मुंडेर पर चढ़ गई। हवा तेज़ थी। उसने नीचे नहीं देखा। उसने अपनी आँखें बंद कीं, भगवान का नाम लिया, और छलांग लगा दी।
उसका एक पैर बालकनी के किनारे पर फिसला। “आह!” उसके मुंह से चीख निकली, लेकिन इससे पहले कि वह नीचे गिरती, उस औरत ने उसे मजबूती से पकड़ लिया और अंदर खींच लिया। दोनों धड़ाम से बालकनी के फर्श पर गिरे।
सुमन कांप रही थी, सांसें फूल रही थीं। लेकिन वह सुरक्षित थी—फिलहाल।
अभी वे संभल भी नहीं पाई थीं कि सुमन वाले कमरे के दरवाजे के खुलने की जोर से आवाज आई। “सुमन!” रोहन की दहाड़ सुनाई दी। वह वापस आ गया था।
“शशश…” औरत ने सुमन का मुंह अपने हाथ से बंद कर लिया और उसे खींचकर अपने कमरे के अंदर ले गई। उन्होंने दरवाजा और पर्दा दोनों गिरा दिए।
दीवार के उस पार से रोहन के चिल्लाने और सामान फेंकने की आवाजें आ रही थीं। “कहाँ गई? खिड़की टूटी है… भाग गई साली!” रोहन गालियां बक रहा था। उसके भारी कदमों की आवाज अब सीढ़ियों से नीचे उतरने की थी। वह गली में उसे ढूंढने जा रहा था।
“सुनो,” उस औरत ने सुमन के कांपते कंधों को पकड़कर सीधा किया। “मेरा नाम सलमा है। मैं ज्यादा देर तुम्हें यहाँ नहीं छुपा सकती। रोहन को पता है कि मैं उसके धंधे के बारे में जानती हूँ, वह शक करेगा और यहाँ भी आएगा।”
सलमा ने एक पुराना शॉल और 500 रुपये का एक नोट सुमन के हाथ में थमाया। “अपना चेहरा इस शॉल से ढक लो। पीछे वाली सीढ़ियों से नीचे उतरो। वह गली मेन रोड पर निकलती है। वहां से सीधे बस स्टैंड जाना और जो पहली बस मिले, उसमें बैठ जाना। दिल्ली में रुकना मत।”
“लेकिन मैं कहाँ जाऊंगी? मुझे कुछ नहीं पता…” सुमन रो पड़ी।
“जहाँ भी जाओ, बस यहाँ मत रुको। यह शहर भेड़ियों का है, और तुम अभी मेमना हो। भागो!” सलमा ने उसे पिछले दरवाजे की तरफ धकेल दिया।
अंजान सफर की ओर

सुमन, शॉल में अपना चेहरा लपेटकर, पीछे की संकरी और अंधेरी सीढ़ियों से नीचे उतरी। उसका दिल अभी भी वैसे ही धड़क रहा था। जैसे ही वह गली में बाहर निकली, दिल्ली की शाम का शोर उसके कानों में गूंजने लगा। गाड़ियाँ, हॉर्न, लोगों की भीड़।
वह भीड़ में मिल गई, लेकिन उसकी नजरें हर चेहरे में रोहन को तलाश रही थीं। हर साया उसे रोहन जैसा लग रहा था। वह तेज कदमों से मेन रोड की तरफ बढ़ी।
तभी, एक काली एसयूवी कार (SUV) धीरे-धीरे उसके बगल में आकर रुकी। कांच नीचे हुआ। सुमन की सांस रुक गई। क्या यह रोहन है?
नहीं, अंदर कोई और था। लेकिन तभी सुमन ने देखा कि सड़क के उस पार, पान की दुकान के पास रोहन खड़ा था। वह फोन पर चिल्ला रहा था और पागलों की तरह इधर-उधर देख रहा था। उसकी नजरें सुमन की दिशा में घूमीं।
सुमन भीड़ की ओट में छिप गई। रोहन की नजर उस पर नहीं पड़ी थी, लेकिन वह बस कुछ ही मीटर दूर था। उसके पास दो रास्ते थे—या तो वह सामने खड़ी पुलिस वैन के पास जाए (लेकिन रोहन की धमकी याद थी कि पुलिस उसके माँ-बाप को फंसा देगी), या फिर वह उस अनजान बस में चढ़ जाए जो अभी-अभी सिग्नल पर रुकी थी।
बस चलने ही वाली थी। सुमन ने एक सेकंड सोचा, और दौड़ पड़ी।
जैसे ही उसने बस के पायदान पर कदम रखा, पीछे से एक आवाज आई- “सुमन!”
यह रोहन की आवाज थी। उसने उसे देख लिया था।
सुमन बस के अंदर चढ़ी। बस ने रफ़्तार पकड़ी। रोहन बस के पीछे दौड़ रहा था। “रोक! बस रोक!” वह चिल्ला रहा था।
सुमन खिड़की के पास दुबक गई, उसका दिल मुंह को आ रहा था। रोहन भीड़ को चीरता हुआ बस के करीब आ रहा था। ट्रैफिक जाम था, बस की रफ़्तार धीमी थी। रोहन बस के दरवाजे तक पहुँच गया था, उसका हाथ हैंडल पर था…
(कहानी अभी बाकी है…अगले अंक में)
See More
दिल्ली का वह अधूरा वादा: उम्मीद, इंतज़ार और सच्चाई। Hindi Love Story. Part 1
दिल्ली का वह अधूरा वादा: उम्मीद, इंतज़ार और सच्चाई। Hindi Love Story. Part 2


Wonderful writer touching stories
Suspence💯
❤❤
Suspense