Hindi Love Story: उस रात गाँव में और रात के अपेछा कुछ ज्यादा ही सन्नाटा था, सन्नाटा इतना ज्यादा था कि सुमन को अपनी ही धड़कनें हथौड़े की चोट जैसी लग रही थीं। बगल में सो रही उसकी माँ की सांसें खरखरा रही थीं। सुमन ने कांपते हाथों से अपनी प्लास्टिक की थैली उठाई। उसमें सिर्फ दो जोड़ी कपड़े और वह एक सस्ती सी पायल थी जो उसके पिताजी ने पिछले साल मेले से दिलाई थी। उसने माँ के पैरों को धीरे से छुआ, मन ही मन माफ़ी मांगी, और बिना पीछे मुड़े अंधेरे में कदम बढ़ा दिया।
दरवाजे की कुंडी खोलते वक्त जो हल्की सी ‘चर्र’ की आवाज हुई, उससे सुमन का कलेजा मुंह को आ गया। लेकिन कोई नहीं जगा। बाहर बहुत तेज ठंडी हवा चल रही थी। गाँव के कुत्ते दूर कहीं भौंक रहे थे, जैसे उसे चेतावनी दे रहे हों। वह लगभग दौड़ती हुई गाँव के बाहर उस पुराने बरगद के पेड़ के पास पहुंची, जहाँ रोहन ने मिलने को कहा था।
रोहन वहां खड़ा था, अंधेरे में सिगरेट का धुआं उड़ाता हुआ। उसे देखते ही सुमन की जान में जान आई। वह दौड़कर उसके गले लग जाना चाहती थी, रोना चाहती थी, लेकिन रोहन का व्यवहार कुछ अलग था। उसने सिगरेट फेंकी और हड़बड़ी में बोला, “इतनी देर क्यों कर दी? ट्रेन छूट जाती तो सब बर्बाद हो जाता। चलो जल्दी!” उसकी आवाज में वह प्यार और नशा नदारद था जो बंद कमरे में हुआ करता था। वहां सिर्फ जल्दबाजी और खीझ थी। सुमन को लगा शायद वह भी तनाव में है, उसने चुपचाप उसका हाथ थाम लिया और चल दी।
सब पीछे छूट गया।
रेलवे स्टेशन की भीड़भाड़ में सुमन ने खुद को बहुत छोटा महसूस कर रही थी। उसने अपनी ज़िंदगी में कभी गाँव की सरहद पार नहीं की थी। ट्रेन के जनरल डिब्बे में चढ़ते ही पसीने और बीड़ी की बदबू ने उसका स्वागत किया। रोहन ने उसे एक कोने वाली सीट पर बिठाया और खुद उसके सामने खड़ा हो गया। ट्रेन ने सीटी दी—एक लंबी, डरावनी चीख—और सुमन का गाँव, उसका घर, उसके माता-पिता, सब पीछे छूट गए।
पूरी रात ट्रेन चलती रही। सुमन की आँखों में नींद नहीं थी, बस रोहन का चेहरा था। लेकिन रोहन… वह बदल रहा था। जो रोहन उसकी एक मुस्कान के लिए घंटों बातें करता था, वह अब अपने फोन में व्यस्त था। जब सुमन ने डरते हुए पूछा, “हम दिल्ली में कहाँ रहेंगे?” तो रोहन ने बिना उसकी तरफ देखे रूखा जवाब दिया, “पहुँच तो जाने दो, सब पता चल जाएगा। ज्यादा सवाल मत करो।” सुमन का दिल बैठ गया। क्या यह वही लड़का है जो कल तक उसे रानी बनाकर रखने की कसमें खा रहा था?
अगली सुबह जब ट्रेन दिल्ली के स्टेशन पर रुकी, तो वहां का शोर सुमन के बर्दाश्त के बाहर था। लोग चींटियों की तरह रेंग रहे थे। रोहन उसका हाथ पकड़कर उसे भीड़ से बाहर खींच लाया। सुमन को लगा वे किसी बड़ी कोठी या अच्छे घर में जाएंगे, जैसा रोहन ने बताया था। लेकिन रोहन ने एक ऑटो रिक्शा रोका और उसे दिल्ली की तंग, गंदी गलियों की तरफ ले चला।
ऑटो एक पुरानी, बदरंग इमारत के सामने रुका। यहाँ की हवा में अजीब सी गंध थी। “ये… ये तुम्हारा घर है?” सुमन ने हिचकिचाते हुए पूछा। रोहन ने एक अजीब सी हंसी हंसते हुए कहा, “अभी के लिए यही है। एडजस्ट कर लो।”
वे तीसरी मंजिल पर एक छोटे से कमरे में गए। कमरे में एक गंदा सा बिस्तर और कोने में एक टीवी रखा था। वही टीवी… सुमन को अपने गाँव के उस दिन की याद आ गई। जैसे ही दरवाजा बंद हुआ, रोहन का चेहरा पूरी तरह बदल गया। वह सफर की थकान या तनाव में नहीं था, बल्कि उसकी आँखों में एक शिकारी जैसा भाव आ गया था।
सुमन ने पानी पीने के लिए बोतल उठाई ही थी कि रोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया। इस बार उसके स्पर्श में प्यार नहीं, क्रूरता थी। “सुनो सुमन,” रोहन ने उसे बिस्तर पर धकेलते हुए कहा, “अब तुम दिल्ली में हो। यहाँ मेरी मर्जी चलती है। घर वालों को भूल जाओ, अब मैं ही तुम्हारा घर हूँ।”
सुमन सहम गई। “रोहन, तुम ऐसे क्यों बात कर रहे हो? तुमने शादी का वादा किया था…”
सच का सामना।

रोहन जोर से हंसा, ऐसी हंसी जिसने सुमन की रीढ़ में सिहरन दौड़ा दी। “शादी? अरे पगली, शादी तो बस एक शब्द है। असली मज़ा तो साथ रहने में है। और हाँ, मेरे कुछ दोस्त भी शाम को आने वाले हैं। उन्हें भी तुमसे मिलना है। अच्छे से तैयार रहना।”
सुमन के पैरों तले जमीन खिसक गई। “दोस्त? कौन दोस्त? रोहन, मुझे घर जाना है!” वह दरवाजे की तरफ भागी।
लेकिन रोहन ने झपट्टा मारकर उसे पकड़ लिया और एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर जड़ दिया। सुमन गिर पड़ी। उसके कान सुन्न हो गए। “आवाज नीचे!” रोहन गुर्राया। “मैंने तुझे यहाँ लाने के लिए पैसे खर्च किये हैं। अब यहाँ से बाहर कदम भी रखा, तो पुलिस को बता दूंगा कि तू घर से गहने चोरी करके भागी है। तेरे माँ-बाप को जेल हो जाएगी।”
रोहन दरवाजा बाहर से लॉक करके चला गया। कमरे में अब सिर्फ सुमन थी और उसकी सिसकियाँ। उसे अब समझ आ रहा था कि टीवी पर दिखाई गई वह ‘अश्लील दुनिया’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि रोहन उसे उसी दुनिया का हिस्सा बनाने के लिए लाया था। वह जाल में फंस चुकी थी।
तभी दरवाजे पर एक दूसरी दस्तक हुई। यह रोहन के जाने के पांच मिनट बाद की बात थी। क्या वह वापस आ गया? या कोई और था? सुमन ने आंसुओं से धुंधली आँखों से दरवाजे को देखा। दरवाजे के नीचे से एक पर्ची अंदर सरकाई गई।
सुमन ने कांपते हाथों से वह पर्ची उठाई। उस पर टूटी-फूटी हिंदी में लिखा था— “लड़की, अगर अपनी इज्जत और जान बचाना चाहती है, तो खिड़की मत खोलना, और शाम होने से पहले यहाँ से भागने का रास्ता ढूंढ ले। रोहन वो नहीं है जो तू समझती है…”
सुमन की सांसे अटक गईं। यह कौन था? क्या इस अनजान शहर में कोई उसका मददगार था, या यह कोई नई चाल थी? उसने खिड़की की तरफ देखा, जहाँ से नीचे का रास्ता बहुत गहरा और खतरनाक दिख रहा था। शाम होने में बस कुछ ही घंटे बचे थे… और रोहन के ‘दोस्त’ आने वाले थे।
(कहानी अभी बाकी है…अगले अंक में)
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