दिल्ली का वह अधूरा वादा: उम्मीद, इंतज़ार और सच्चाई | Hindi Love Story – Part 5

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अनजानी राहें और पीछा करता साया

Hindi Love Story: सुमन की धड़कनें उस बूढ़ी अम्मा के सवाल से थम सी गईं थीं। “घर छोड़कर भागी है क्या?”

सुमन ने एक झटके में अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। वह जवाब नहीं देना चाहती थी, क्योंकि जवाब देते ही वह रो पड़ेगी, और अगर वह रोई, तो पूरा बस उसकी तरफ देखेगा। उसने अपनी शॉल को और कसकर लपेटा और खिड़की के बाहर देखने लगी। बाहर घुप अंधेरा था, बस हाईवे की पीली लाइटें किसी भूतिया परछाई की तरह पीछे छूट रही थीं।

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद, एक झुर्रियों वाला हाथ सुमन की गोद में आया। उसमें कागज में लिपटी दो रोटी और आम का अचार था। “ले, खा ले,” अम्मा की आवाज में अब वह तीखापन नहीं था। “मुंह से कुछ मत बोल, लेकिन तेरा पेट और चेहरा सब बता रहा है। मैं भी कभी 19 साल की थी, और दुनिया की ठोकरें मैंने भी बहुत खाई हैं।”

सुमन ने उस खाने को देखा और उसकी भूख, जो डर के मारे मर चुकी थी, अचानक जाग उठी। उसने कांपते हाथों से रोटी का टुकड़ा तोड़ा। जैसे ही पहला निवाला गले से नीचे उतरा, उसकी आँखों से आंसुओं का सैलाब फिर बह निकला। इस बार वह सिसकी नहीं, बस आंसू गिरते रहे। अम्मा ने कुछ नहीं कहा, बस अपनी पानी की बोतल उसकी तरफ बढ़ा दी।

बस पूरी रफ्तार में थी। दिल्ली पीछे छूट चुकी थी, लेकिन सुमन का डर नहीं। हर बार जब बस की रफ्तार धीमी होती या कोई नई सवारी चढ़ती, सुमन की सांसें अटक जातीं। उसे हर पल लगता कि अभी रोहन बस के दरवाजे पर खड़ा दिखाई देगा। वह लड़का जिसने उसे प्यार का सपना दिखाया था, अब उसके लिए यमराज बन चुका था।

रात के करीब 2 बजे बस एक सुनसान ढाबे पर रुकी। “पंद्रह मिनट का स्टॉप है! खाना-पीना कर लो!” ड्राइवर ने चिल्लाकर कहा।

सवारियां उतरने लगीं। अम्मा भी उठीं। “चल बेटी, नीचे चल। हाथ-मुंह धो लेगी तो ताजी हवा से डर थोड़ा कम लगेगा।” सुमन ने न में सिर हिलाया। “नहीं अम्मा, मैं यहीं ठीक हूँ।” वह अपनी सीट से हिलना भी नहीं चाहती थी। उसे लग रहा था कि बस की ये लोहे की दीवारें ही उसकी सुरक्षा कवच हैं।

अम्मा नीचे उतर गईं। सुमन बस में अकेली रह गई, सिवाय पीछे की सीट पर सो रहे एक आदमी के। वह खिड़की से बाहर झांक रही थी। ढाबे पर कई ट्रक और गाड़ियाँ खड़ी थीं। तभी उसकी नजर एक सफेद रंग की बोलेरो कार पर पड़ी जो अभी-अभी ढाबे के सामने आकर रुकी थी।

उसमें से तीन लड़के उतरे। उनका हुलिया, उनके चलने का अंदाज… सब कुछ रोहन के उन ‘दोस्तों’ जैसा लग रहा था जिनका उसने जिक्र किया था। सुमन का खून जम गया। क्या वे उसका पीछा कर रहे हैं? क्या रोहन ने अपने आदमियों को अलग-अलग रास्तों पर भेज दिया है?

लड़कों में से एक की नजर बस की तरफ घूमी। सुमन तुरंत सीट के नीचे दुबक गई। उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे लगा उसकी आवाज बाहर तक सुनाई देगी। वह सांस रोके, आँखें बंद किए भगवान से प्रार्थना कर रही थी। ‘हे भगवान, आज बचा ले। बस आज…’

करीब दस मिनट तक वह वैसे ही सिकुड़ी रही। फिर बस का इंजन गड़गड़ाया और बस चल पड़ी। जब बस ने रफ्तार पकड़ ली, तब जाकर सुमन ने सीट से सिर उठाया। वह पसीने से तर-बतर थी। अम्मा वापस अपनी सीट पर बैठ चुकी थीं और उसे गौर से देख रही थीं। “तू जिससे भाग रही है, वो बहुत ताकतवर है क्या?” अम्मा ने धीमे स्वर में पूछा।

सुमन ने बस इतना कहा, “वह मुझे मार डालेगा, अम्मा। और मेरे घर वालों को भी नहीं छोड़ेगा।”

सुबह के 5 बजते-बजते खिड़की के बाहर का नजारा बदलने लगा। हरे-भरे खेतों की जगह अब सूखी झाड़ियां और रेत के टीले दिखने लगे थे। गुलाबी शहर जयपुर की सीमा शुरू हो चुकी थी।

बस ‘सिंधी कैंप’ बस स्टैंड पर रुकी। “जयपुर आ गया! सब उतरो!”

सुमन बस से उतरी। नई जगह, नई भाषा, और नए लोग। यहाँ की हवा में दिल्ली जैसी उमस नहीं थी, लेकिन एक सूखापन था। उसके पास अब सिर्फ 200 रुपये बचे थे। वह जानती थी कि इतने पैसों में वह एक दिन भी नहीं काट पाएगी।

नया ठिकाना

“अब कहाँ जाएगी?” अम्मा ने अपना थैला उठाते हुए पूछा। सुमन चुप थी। उसके पास कोई योजना नहीं थी। “देख,” अम्मा ने कहा, “मेरा नाम ‘कावेरी’ है। मैं यहाँ चांदपोल के पास एक छोटी सी चाय की दुकान चलाती हूँ और ऊपर वाले कमरे में रहती हूँ। मेरा कोई बाल-बच्चा नहीं है। अगर तुझे ठीक लगे, तो कुछ दिन मेरे साथ रह सकती है। बदले में दुकान पर हाथ बंटा देना। फोकट की रोटी मैं किसी को नहीं देती।”

सुमन के लिए यह प्रस्ताव किसी डूबते को तिनके के सहारे जैसा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस अनजान औरत पर भरोसा करे या नहीं, लेकिन सलमा ने उसे एक सीख दी थी— ‘दिल्ली में भरोसा मत करना’। पर अब वह जयपुर में थी, और उसके पास कोई और रास्ता नहीं था। उसने चुपचाप सिर हिलाया और अम्मा के पीछे चल दी।

कावेरी अम्मा का घर एक पुरानी हवेली के खंडहर जैसा था, जो अब कई छोटे-छोटे कमरों में बंट चुका था। निचली मंजिल पर चाय की दुकान थी। सुमन को एक छोटा सा कोना मिला।

दो दिन बीत गए। सुमन ने दुकान पर बर्तन धोने और चाय परोसने का काम शुरू कर दिया। उसने अपना नाम बदलकर ‘रानी’ बता दिया था। वह हर वक्त अपना चेहरा दुपट्टे से ढके रहती थी। उसकी नजरें हर ग्राहक पर टिकी रहतीं—कहीं कोई रोहन का आदमी तो नहीं?

तीसरे दिन दोपहर को, जब दुकान पर भीड़ कम थी, सुमन की बेचैनी हद से बढ़ गई। उसे अपनी माँ की चिंता सता रही थी। रोहन ने धमकी दी थी कि वह पुलिस को बताएगा कि सुमन गहने चोरी करके भागी है। क्या उसने सच में ऐसा किया होगा?

दुकान के सामने एक पीसीओ (PCO) बूथ था। सुमन ने अपनी कमाई के सिक्कों को मुट्ठी में भींचा और वहां गई। उसने कांपते हाथों से अपने पड़ोस के चाचा का नंबर मिलाया, जिनके घर पर फोन था।

घंटी बजी… एक बार, दो बार। “हेलो?” चाचा की आवाज आई। “चाचा… मैं… मैं सुमन बोल रही हूँ,” सुमन की आवाज भर्रा गई।

उधर से एक पल की खामोशी छा गई। फिर चाचा की घबराई हुई आवाज आई, “सुमन? तू कहाँ है बेटी? यहाँ गजब हो गया है!”

“क्या हुआ चाचा? माँ ठीक है?” सुमन का दिल बैठने लगा।

“तेरी माँ को पुलिस वाले थाने ले गए हैं,” चाचा ने जो बताया, उसने सुमन के पैरों तले जमीन खींच ली। “कल एक लड़का आया था, दिल्ली से। रोहन नाम था उसका। उसने रपट लिखवाई है कि तूने उसके घर से 5 लाख रुपये और सोना चोरी किया है और फरार हो गई है। पुलिस ने तेरे बाबूजी को बहुत मारा और तेरी माँ को पूछताछ के लिए ले गई है। वो कह रहे हैं जब तक तू वापस नहीं आएगी, वो उन्हें नहीं छोड़ेंगे।”

सुमन के हाथ से फोन का रिसीवर छूटकर लटक गया।

रोहन ने अपनी चाल चल दी थी। उसने सिर्फ सुमन को फंसाया नहीं था, बल्कि उसे ऐसी जगह चोट पहुँचाई थी जहाँ वह सबसे ज्यादा कमजोर थी। वह जानती थी कि उसका बाप और भाई पुलिस की मार नहीं सह पाएंगे, और बीमार माँ थाने में दम तोड़ देगी।

उसने वहाँ से भागकर अपनी जान तो बचा ली थी, लेकिन अब उसका परिवार दांव पर था।

पीसीओ वाले ने चिल्लाया, “ए मैडम! फोन रख दिया क्या? पैसे तो देती जा!”

सुमन सुन्न खड़ी थी। उसके कानों में रोहन की वह हंसी गूंज रही थी जो उसने उस कमरे में सुनी थी। “अब मैं ही तुम्हारा घर हूँ…”

अब उसके पास दो ही रास्ते थे:

  1. वापस दिल्ली जाए और खुद को उस दरिंदे के हवाले कर दे ताकि माँ-बाप छूट जाएं।
  2. या फिर यहीं से कुछ ऐसा करे जिससे रोहन का झूठ बेनकाब हो सके।

लेकिन एक 19 साल की अनपढ़, गरीब लड़की, जिसके पास न पैसा है न ताकत, वह पुलिस और रोहन जैसे शातिर इंसान से कैसे लड़ेगी?

तभी, कावेरी अम्मा ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रखा। उन्होंने पीसीओ पर हुई बातें शायद सुन ली थीं या सुमन का चेहरा देख समझ गई थीं। “वापस शेर की मांद में जाने की सोच रही है?” अम्मा ने कड़क आवाज में पूछा।

सुमन रोते हुए उनके पैरों में गिर पड़ी। “अम्मा, वो मेरे माँ-बाप को मार डालेंगे। मुझे जाना होगा।”

अम्मा ने उसे पकड़कर खड़ा किया। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “अगर तू वापस गई, तो वो तुझे नोच खाएंगे और तेरे माँ-बाप को फिर भी नहीं छोड़ेंगे। रोहन जैसे लोग सौदा नहीं करते, शिकार करते हैं।” अम्मा ने अपनी कमर से चाबियों का गुच्छा निकाला। “तुझे लड़ना होगा। और लड़ने के लिए दिल्ली जाने की जरूरत नहीं है। मेरा एक भतीजा है… वकील है, लेकिन थोड़ा टेढ़ा है। उसे तेरी कहानी बतानी होगी।”

सुमन ने आंसुओं के बीच अम्मा को देखा। क्या सच में कोई रास्ता है? या यह एक और जाल है?

अभी वे बात कर ही रहे थे कि सड़क पर एक पुलिस की जीप सायरन बजाते हुए गुजरी। सुमन सहम कर दुकान के अंदर भागी। क्या यह जीप उसके लिए थी? क्या जयपुर पुलिस को भी उसकी खबर लग गई है?

कहानी अब सिर्फ भागने की नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने की जंग बन चुकी थी। और इस जंग में सुमन अकेली थी, या शायद नहीं…

(कहानी अभी बाकी है…शेष अगले अंक में)

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नमस्ते, मैं तनीषा एक डिजिटल क्रिएटर जो जिंदगी को बिना किसी फिल्टर (Unfiltered) के जीने में यकीन रखती हूँ। खूबसूरती हो या करियर, रिश्ते हों या पैसा मैं हर चीज़ में परफेक्शन तलाशती हूँ। 'Dilsetanisha' के ज़रिये मैं आपके साथ शेयर कर रही हूँ अपने स्टाइल सीक्रेट्स, रिलेशनशिप एडवाइस और सफल होने के राज़।
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