Pyaar Ka Punarjanm: वाराणसी, वह पवित्र नगरी जहां गंगा की लहरें हर दिल की धड़कनों को सुनती हैं, और मंदिरों की घंटियां प्रेम और विश्वास की कहानियां गुनगुनाती हैं। बाबा भोलेनाथ की इस नगरी में एक ऐसी कहानी ने जन्म लिया, जो न केवल सुनने में अजीब है, बल्कि सामाजिक रीतियों को भी एक नया राह दे गई। यह कहानी है रीना, सियाराम और अरविंद की—एक ऐसी प्रेम कहानी, जिसने 25 साल की शादी, दो बच्चों और अनगिनत यादों के बाद भी प्यार को जिंदा रखा, और इसकी शुरूआती एक बलिदान के साथ नई शुरु हुई।
Pyaar Ka Punarjanm: रीना और सियाराम
NBT में छपे खबर के अनुसार, कहानी की शुरुआत होती है आज से करीब 25 साल पहले , जब मिर्जापुर के अहिरौरा गांव की रीना देवी की शादी चंदौली के दुल्हीपुर के अरविंद कुमार पटेल से हुई थी। भारतीय परंपराओं के साथ सजी-धजी रीना ने अरविंद के साथ सात फेरे लिए, और उन दोनों ने एक दूसरे से सपनों का एक नया संसार बसाने का वादा किया।
शादी के कुछ साल बाद दोनों के दो बच्चे हुए, एक बेटी, जो अब अपनी नई गृहस्थी में खुश है, जिसकी शादी अभी हाल ही में हुई है, और एक 18 साल का बेटा, जो अपनी जिंदगी के सुनहरे रास्तों पर कदम रख रहा है, और आगे की भविष्य की । लेकिन, रीना के दिल में एक अनकहा सत्य दबा था—एक पुराना प्यार, जो समय के साथ भी धुंधला नहीं हुआ था।
रीना की जिंदगी में सियाराम यादव का नाम कोई नया नहीं था। बीस साल पहले, जब रीना और सियाराम की राहें एक-दूसरे से टकराई थीं, तब उनके बीच एक अनकहा प्यार भरा रिश्ता पनपने लगा था। सियाराम, एक साधारण परचून की दुकान चलाने वाला 50 वर्षीय व्यक्ति है, उसकी सादगी और गहरी नजरों में कुछ ऐसा था, जो रीना को हमेशा अपनी ओर खींचता था। लेकिन समाज, परिवार के डर और परिस्थितियों ने उनके प्यार को उस वक्त बंधन में बांध दिया था। रीना ने फिर अपनी शादीशुदा जिंदगी को चुना और लाइफ में आगे बढ़ गई, और सियाराम ने खामोशी से अपने दिल को समझाया। और अपने काम में लग गया।
अनबन और फिर शक की छाया
समय ऐसे ही बीतता गया, और कुछ सालो बाद से ही अरविंद-रीना की शादी में छोटी-मोटी अनबन ने जगह बना ली। रीना ने घर के रोज रोज के लड़ाई झगड़े से तंग आकर चंदौली के हमीदपुर में किराए के मकान में रहना शुरू किया, और यहीं से कहानी ने एक नया मोड़ लिया। अरविंद को रीना के व्यवहार में कुछ बदलाव नजर आने लगे।
पति का मन शक की आंधी में उलझने लगा। उसने रीना की जासूसी शुरू की, और एक दिन वह सत्य सामने आया, जिसने अरविंद के दिल को पूरी तरह से झकझोर दिया। रीना और सियाराम एक कमरे में एक-दूसरे के साथ थे, वह पल, जो किसी और कहानी में हिंसा या गुस्से का कारण बन सकता था, लेकिन अरविन्द ने काफी सोच समझकर उस वक़्त कुछ नहीं बोला।
प्यार का बलिदान: एक नए अंदाज में
अरविंद ने उस पल में गुस्से को नहीं, बल्कि अपने प्यार और समझ को चुना। उसने रीना और सियाराम को रंगे हाथ पकड़ा, लेकिन बदले की आग में जलने के बजाय, उसने अपने परिजनों और दोस्तों को बुलाया। एक सभा हुई, जिसमें रीना ने खुलकर स्वीकार किया कि वह सियाराम से प्यार करती है, और यह प्यार पिछले 20 सालों से उसके दिल में जिंदा है। सियाराम ने भी चुप्पी तोड़ी और अपनी भावनाओं को स्वीकार किया। यह सुनकर अरविंद ने एक ऐसा फैसला लिया, जो न केवल वाराणसी, बल्कि पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है।
उसने कहा, “अगर रीना का सच्चा प्यार सियाराम में है, तो मैं उसे बंधन में नहीं रखूंगा। प्यार को आजाद करना ही इन्साफ है।” अरविंद ने रीना और सियाराम की शादी कराने का फैसला किया। हालाँकि यह कोई सनक नहीं थी, बल्कि एक गहरी समझ और सामाजिक मर्यादाओं को बनाए रखने की कोशिश थी। ताकि भविष्य में किसी से किसी तरह का अपराध न हो जाए।
जब रिश्ते हुए आजाद
वाराणसी के राजातालाब में स्थित एक प्राचीन महादेव मंदिर इस अनोखी प्रेम कहानी का साक्षी बना। मंदिर की पवित्र भूमि पर, वैदिक मंत्रों की गूंज के बीच, रीना और सियाराम ने एक-दूसरे का हाथ थामा। वरमाला, सिंदूरदान, और सात फेरों की रस्मों के साथ उनकी शादी संपन्न हुई। मंदिर प्रशासन ने इस विवाह को पूरे विधि-विधान से संपन्न कराया और एक प्रमाणपत्र भी जारी किया।
अब रीना की मांग में सियाराम का सिंदूर चमका रहा था, और उनके चेहरों पर एक नई शुरुआत की मुस्कान थी और खुश भी थी। अरविंद वहां मौजूद था—न केवल एक पति के रूप में, बल्कि एक ऐसे इंसान के रूप में, जिसने प्यार को सम्मान दिया। और अपनी पत्नी को हमेशा के लिए आजाद कर दिया।
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