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Old Rituals: शादी के बाद सवा महीने तक क्यों नहीं निकलती है नई दुल्हन घर से बाहर? जानिए इस परंपरा और इसके पीछे का कारण।

Old Rituals: इस समय पुरे देश में इंदौर के राजा रघुवंशी हत्याकांड सुर्खियां बटोरी हैं। इस मामले में राजा की नई-नवेली दुल्हन सोनम रघुवंशी और उसके प्रेमी राज कुशवाह सहित चार लोगों पर हत्या का आरोप लगा है। बताया जा रहा है कि राजा और सोनम हनीमून के लिए शिलांग गए थे, जहां राजा की हत्या कर दी गई। इस घटना ने एक बार फिर से शादी के बाद की होने वाली परंपराओं पर चर्चा को जन्म दे दिया है।

सोनम के पिता देवी सिंह ने बताया कि बेटी की विदाई का मुहूर्त 5 जून को निकाला गया था, लेकिन दोनों बिना मुहूर्त के ही घूमने चले गए। इस बीच मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि शादी के तुरंत बाद नए जोड़ों को हनीमून के लिए दूर भेजना ठीक नहीं है। उन्होंने पुरानी परंपराओं की ओर लौटने की सलाह दी।

देश के कई हिस्सों में शादी के बाद नई दुल्हन से जुड़ी एक खास परंपरा है, जिसके तहत उसे सवा महीने तक घर से बाहर दूर नहीं जाने दिया जाता। आइए, जानते हैं कि आखिर यह परंपरा क्या है और इसके पीछे का कारण क्या है।

क्या है सवा महीने की परंपरा?

उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य राघव शास्त्री जी बताते हैं कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में शादी-विवाह से जुड़े कई लोकाचार और परंपराएं प्रचलित हैं। इनमें से एक खास परंपरा है कि शादी के बाद जब दुल्हन अपने ससुराल आती है, तो उसे सवा महीने (लगभग डेढ़ महीने) तक घर से बाहर दूर जाने की अनुमति नहीं दी जाती। इस दौरान दुल्हन को परिवार के साथ समय बिताने और ससुराल के रीति-रिवाजों को समझने का मौका दिया जाता है।

हालांकि, इस अवधि में दुल्हन की मायके और ससुराल के बीच विदाई की रस्में पूरी की जाती हैं, जिन्हें कुछ जगहों पर ‘अहोरा’ और ‘बहोरा’ कहा जाता है। इन रस्मों में दुल्हन अपने मायके और ससुराल के बीच आती-जाती है, ताकि वह दोनों परिवारों से परिचित हो सके। लेकिन कुछ जगहों पर इस दौरान दुल्हन को बिल्कुल भी घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता और वह ससुराल में ही रहती है। सवा महीने पूरे होने के बाद ही उसे बाहर जाने की इजाजत मिलती है।

क्यों बनी यह परंपरा?

ज्योतिषाचार्य राघव शास्त्री जी के अनुसार, यह परंपरा पुराने समय में इसलिए शुरू की गई थी ताकि नई दुल्हन को ससुराल के तौर-तरीकों, रीति-रिवाजों और परिवार की संस्कृति को समझने का पूरा समय मिले। पहले के समय में लोग मानते थे कि शादी के बाद दुल्हन को परिवार के साथ घुलने-मिलने और उनके रिवाजों को सीखने के लिए समय चाहिए। इस दौरान उसे यह भी बताया जाता था कि परिवार के कुलदेवता और ग्रामदेवता कौन हैं और उनकी पूजा की विधि क्या है।

इसके अलावा, इस परंपरा के पीछे सुरक्षा का पहलू भी जुड़ा हुआ है। पहले के समय में यात्रा करना उतना सुरक्षित नहीं माना जाता था, खासकर नई दुल्हन के लिए, जो अभी ससुराल में नई होती थी। इसलिए उसे सवा महीने तक घर में ही रखा जाता था, ताकि वह सुरक्षित रह सके और परिवार के साथ तालमेल बिठा सके। हालांकि, इस दौरान दुल्हन को मंदिर या स्थानीय धार्मिक स्थलों पर जाने की छूट होती थी।

आज के समय में कितना मानते हैं लोग?

आज के आधुनिक दौर में इस परंपरा को मानने वालों की संख्या कम हो रही है। शहरी क्षेत्रों में लोग इसे पुरातन मानते हैं और शादी के तुरंत बाद हनीमून या घूमने की योजना बनाते हैं। फिर भी, ग्रामीण इलाकों और पारंपरिक परिवारों में यह रिवाज आज भी कही कही देखने को मिलता है। ज्योतिषाचार्य भट्ट कहते हैं कि देश और काल के हिसाब से परंपराएं बदलती रहती हैं, और आज के समय में सभी लोग इसे मानें, यह जरूरी नहीं है। फिर भी, यह परंपरा हमारी संस्कृति का एक अहम हिस्सा है, जो परिवार में नई दुल्हन के स्वागत और उसे अपनाने की भावना को दर्शाती है।

इंदौर हत्याकांड और परंपराओं पर बहस

राजा रघुवंशी हत्याकांड ने इस परंपरा को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। सीएम मोहन यादव ने भी इस घटना के बाद पुरानी परंपराओं को अपनाने की बात कही है, जिससे उनकी बातो कई लोग सहमत भी हैं। उनका कहना है कि शादी के तुरंत बाद लंबी यात्रा पर जाने के बजाय नए जोड़े को परिवार के साथ समय बिताना चाहिए। यह न केवल परिवार के बीच रिश्तों को मजबूत करता है, बल्कि नए जोड़े को एक-दूसरे को समझने का मौका भी देता है।

निष्कर्ष

शादी के बाद सवा महीने तक दुल्हन को घर से बाहर न भेजने की परंपरा हमारी संस्कृति का एक बेहद ही खूबसूरत हिस्सा है। यह परंपरा नई दुल्हन को परिवार में शामिल करने, उसे रीति-रिवाज सिखाने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई थी। भले ही आज के समय में इस परंपरा को सभी लोग नहीं मान रहे हैं, लेकिन यह हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, अगर पुराने समय में कोई रीती रिवाज बनाया गया था तो उसके पीछे वजह भी था, भले ही आज के पढ़े लिखे लोग इसे बकवास कह कर ठुकरा दे रहे है, लेकिन सच से कैसे इंकार कर सकते हैं।

आप इस परंपरा के बारे में क्या सोचते हैं? क्या आप इसे आज भी प्रासंगिक मानते हैं? अपने विचार हमारे साथ जरूर शेयर करें।

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1 comment

Rajendrasingh yadav June 11, 2025 at 12:58 pm

समय के हिसाब से परंपरा बनती और बदलती रहती है
और यही होना चाहिए ❤

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