Romantic Story: ट्रेन के सफर में मिला हमसफर

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Romantic Story: मैं, आकांक्षा, आज भी उस रात को याद करती हूँ तो रोमांच से भर उठती हूँ । ये कहानी मेरी और राजेश की है, दो अजनबियों की, जिन्हें एक ट्रेन की यात्रा ने एक-दूसरे के इतने करीब ला दिया कि दिल की अब कोई लाख चाहे भी तो हम जुदा नहीं हो सकते, लेकिन ये कहानी सिर्फ़ उस ट्रेन की रात की नहीं है—ये उन चमकती दुर्गापूजा की रातों की भी है, जब कोलकाता की गलियों में ढाक की थाप गूँज रही थी, और मेरे दिल में राजेश के लिए एक अनजानी सी हलचल बढ़ती जा रही थी।

वो अक्टूबर का महीना था, जब दिल्ली की हल्की ठंड ने मेरे कोलकाता लौटने के इरादे को और पक्का कर दिया। मैं दिल्ली किसी निजी काम से आई थी—एक कागज़ी काम, जिसके बारे में मैं अभी ज़्यादा बात नहीं करना चाहती। बस इतना कहूँगी कि वो मेरे परिवार के लिए ज़रूरी काम था। काम निपट चुका था, और मैं हावड़ा एक्सप्रेस में अपनी लोअर सीट पर बैठी थी, खिड़की के पास।

मेरे कानों में इयरफोन थे, और मैं रवींद्रनाथ टैगोर की कविताओं की ऑडियोबुक सुन रही थी। कोलकाता की यादें मेरे ज़हन में तैर रही थीं—माँ दुर्गा की विशाल मूर्तियाँ, पंडालों की रौनक, और मिष्टि की मिठास। क्योकि दिल्ली आये हुए मुझे करीब एक महीना होने को आया था, मैं दिल्ली में अपने मामा जी के पास ठहरी थी। यही पर उनका अपना बिजनेस हैं।

ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी, और मैंने ऑडियो सुनना बंद कर अपनी किताब खोली। मेरे बगल की सीट खाली थी, और मैंने सोचा कि शायद इस बार मुझे थोड़ा सुकून मिलेगा। लेकिन किस्मत को कुछ और मंज़ूर था। करीब आधे घंटे बाद, जब ट्रेन कानपुर के पास थी, एक लड़का मेरे कंपार्टमेंट में दाखिल हुआ। वो लंबा था, शायद 5 फीट 10 इंच, और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने एक काला बैकपैक कंधे पर लटकाया हुआ था और हाथ में पानी की बोतल थी। उसने मेरे सामने वाली सीट पर नज़र डाली, फिर टिकट चेक किया और मेरे बगल वाली सीट पर बैठ गया।

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मैंने उसे एक तिरछी नज़र से देखा और अपनी किताब में ध्यान लगाने की कोशिश की। लेकिन मेरी नज़र बार-बार उसकी तरफ चली जाती थी। उसने अपने बैग से एक नोटबुक निकाला और कुछ लिखने लगा। कौन आजकल ट्रेन में नोटबुक में लिखता है? मैंने इयरफोन निकाले और पूछा, “एक्सक्यूज़ मी, आप क्या लिख रहे हैं?”

वो थोड़ा चौंका, फिर मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में एक सादगी थी। “बस, कुछ स्केच बना रहा हूँ,” उसने कहा। “मैं कोलकाता जा रहा हूँ, दुर्गापूजा देखने। सोचा, रास्ते में कुछ ड्रॉ कर लेता हूँ।

“कोलकाता?” मैंने उत्साह से कहा। “मैं भी वहीं जा रही हूँ। आप वहाँ कहाँ रहते हैं?”

“मैं कोलकाता का नहीं हूँ,” उसने हँसते हुए कहा। “मेरी बुआ दमदम में रहती हैं। मैं दिल्ली में रहता हूँ, इस बार बुआ ने दुर्गापूजा देखने के लिए बुलाया है, और मेरा भी मन था वहां का दुर्गापूजा देखने का, इसी सिसिले में जा रहा हू। वैसे मेरा नाम राजेश है।”

“आकांक्षा,” मैंने अपना नाम बताया। ” और मैं कोलकाता की ही हूँ।”

उसके बाद हमारी बातचीत शुरू हुई। पहले औपचारिक बातें—दुर्गापूजा के पंडाल, कोलकाता की सड़कें, दिल्ली की भागदौड़। फिर बातें गहरी होने लगीं। राजेश ने बताया कि वो एक ग्राफिक डिज़ाइनर है और उसे स्केचिंग का शौक है। उसने मुझे अपनी नोटबुक दिखाई, जिसमें माँ दुर्गा की एक खूबसूरत स्केच थी। उस स्केच में माँ की आँखों की गहराई मुझे छू गई।

“तुम बहुत अच्छा स्केच बनाते हो,” मैंने तारीफ की।

“थैंक्स,” उसने कहा, और थोड़ा रुककर बोला, “वैसे, तुम क्या करती हो?”

मैंने बताया कि मैं एक स्कूल टीचर हूँ और मुझे बच्चों को बंगाली साहित्य पढ़ाना पसंद है। राजेश ने उत्सुकता से पूछा कि मुझे कौन से लेखक पसंद हैं। मैंने रवींद्रनाथ टैगोर और शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का ज़िक्र किया। उसने हँसकर कहा, “मैंने सिर्फ़ ‘गीतांजलि’ पढ़ी है, वो भी स्कूल में। लेकिन तुम्हारी बातों से लगता है कि मुझे और पढ़ना चाहिए।”

रात गहरी हो चली थी। राजेश ने अपने बैग से मूंगफली का पैकेट निकाला और बोला, “कुछ खाएँ?” मैंने हँसते हुए कहा, “ट्रेन में मूँगफली कौन लाता है?” उसने शरारत भरी मुस्कान के साथ जवाब दिया, “मैं। ये दिल्ली की सड़कों से खरीदी स्पेशल मूँगफली है।” हमने मूँगफली खाते हुए बाकी के बातें की, हमने उस रात ढेर सारी दुनिया जहां की बाते की। रात के बारह बज चुके थे, लेकिन न मुझे नींद आई, न उसे।

अगली सुबह, जब मैं उठी, राजेश बाहर का नज़ारा देख रहा था। सूरज की किरणें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। मैंने उसे गुड मॉर्निंग कहा, और उसने मुझे कॉफी का एक पेपर कप दिया। “स्टेशन पर उतरकर लिया था,” उसने कहा। “सोचा, तुम्हें पसंद आएगी।”

मैंने कॉफी पीते हुए पूछा, “तुम हमेशा इतने thoughtful रहते हो, या ये ट्रेन का जादू है?”

“शायद ट्रेन का जादू,” उसने हँसकर कहा। “लेकिन तुमसे बात करके अच्छा लग रहा है, आकांक्षा।”

उस दिन हमारी बातें और गहरी हुईं। उसने बताया की वो एक भविष्य में आर्ट गैलेरी खोलना चाहता हैं। मैंने अपनी छोटी सी लाइब्रेरी का सपना साझा किया। शाम तक हम कोलकाता के करीब पहुँच चुके थे। हावड़ा स्टेशन पर ट्रेन रुकी, और मेरे दिल में एक बेचैनी थी। क्या ये मुलाकात यहीं खत्म हो जाएगी? मैंने उससे उसका नंबर लिया, और उसने वादा किया कि वो दुर्गापूजा में मेरे साथ पंडाल घूमेगा।

दुर्गापूजा की रौनक और हमारी नज़दीकियाँ

Mata Durga ka Pandal
Mata Durga ka Pandal, Image Credit Canva.

अगले दिन, दुर्गापूजा की चमक कोलकाता की गलियों में बिखरी थी। मैंने राजेश को मैसेज किया, और वो मेरे घर के पास वाले पंडाल में मुझसे मिलने आया। उसने एक साधारण सफेद कुर्ता पहना था, लेकिन उसकी आँखों की चमक वही थी। मैंने उसे अपने मोहल्ले के पंडाल में ले जाने का फैसला किया, जो हर साल अपनी थीम के लिए मशहूर था। इस बार थीम थी ‘प्रकृति और देवी’। पंडाल में हर तरफ हरे-भरे पेड़ों की सजावट थी, और माँ दुर्गा की मूर्ति एक झरने के सामने थी।

“वाह,” राजेश ने मूर्ति देखकर कहा। “ये तो जादुई है।”

मैंने हँसते हुए कहा, “अभी तो ये शुरुआत है। कोलकाता के पंडालों का असली जादू तुम्हें रात में दिखाऊँगी।”

हमने वहाँ भोग खाया—खिचड़ी, लबड़ा, और बेगुन भजा। राजेश ने बंगाली खाने की तारीफ की, और मैंने उसे चिढ़ाते हुए कहा, “दिल्ली में तो तुम पिज़्ज़ा-बर्गर खाते होगे।” उसने हँसकर जवाब दिया, “अब कोलकाता आकर बंगाली खाने का दीवाना हो जाऊँगा।”

उस रात, मैंने उसे कुमर्तुली के पंडालों में ले जाने का फैसला किया। कुमर्तुली, जहाँ मूर्तियाँ बनती हैं, दुर्गापूजा के दौरान एक अलग ही रंग में डूबा होता है। हम ऑटो से वहाँ पहुँचे। रास्ते में, राजेश ने मेरे हाथ में बनाया एक छोटा सा स्केच थमाया। “ये मैंने ट्रेन में बनाया था,” उसने कहा। स्केच में एक लड़की थी, जो खिड़की से बाहर देख रही थी। “ये तुम हो,” उसने धीरे से कहा।

मेरे गाल लाल हो गए। “तुम सचमुच बहुत अच्छा बनाते हो,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में एक हल्की सी शरारत थी।

कुमर्तुली के पंडालों में घूमते हुए, हम एक-दूसरे के और करीब आए। एक पंडाल में, जहाँ ढाक की थाप गूँज रही थी, राजेश ने मुझसे कहा, “आकांक्षा, तुम्हें नाचना आता है?” मैंने हँसकर कहा, “बंगाली लड़की हूँ, ढाक की थाप पर नाचना तो बनता है।” मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसे भीड़ में खींच लिया। हमने साथ में खूब नाचा, और उसकी हँसी मेरे कानों में गूँज रही थी।

अगले दिन, मैंने उसे बागबाज़ार के पंडाल में ले जाने का प्लान बनाया। वहाँ का पंडाल अपनी भव्यता के लिए मशहूर था। हमने रास्ते में फुचका खाया, और राजेश ने पहली बार फुचका खाते हुए जो मुँह बनाया, वो देखकर मैं हँसते-हँसते लोटपोट हो गई। “ये तो आग है!” उसने कहा, और मैंने उसे चिढ़ाया, “दिल्ली वाले का मुँह जल गया!”

बागबाज़ार में, जब हम माँ दुर्गा की मूर्ति के सामने खड़े थे, राजेश ने धीरे से कहा, “आकांक्षा, मुझे नहीं पता था कि कोलकाता इतना खूबसूरत हो सकता है। या शायद… तुम्हारे साथ होने की वजह से सब खूबसूरत लग रहा है।” उसकी बात सुनकर मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई। मैंने बस मुस्कुराकर उसकी तरफ देखा, क्योंकि मेरे पास शब्द नहीं थे।

दुर्गापूजा के आखिरी दिन, मैंने उसे साल्ट लेक के एक पंडाल में ले जाने का फैसला किया। वहाँ का माहौल शांत था, और हम एक बेंच पर बैठकर माँ दुर्गा की विदाई की तैयारी देख रहे थे। राजेश ने मेरे हाथ में एक और स्केच दिया। इस बार उसने मुझे स्केच किया था—मेरी मुस्कान, मेरे बाल, और मेरी आँखों की चमक।

“ये तुम हो, आकांक्षा,” उसने कहा। “मैं चाहता हूँ कि तुम हमेशा ऐसे ही मुस्कुराओ।”

मैंने उसकी आँखों में देखा, और मुझे लगा कि ये सिर्फ़ दुर्गापूजा की रौनक नहीं थी। ये कुछ और था—कुछ ऐसा, जो मेरी ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल देगा। उस रात, जब हम पंडाल से लौट रहे थे, राजेश ने मेरा हाथ पकड़ा। उसका स्पर्श गर्म था, और मेरे दिल में एक सुकून सा छा गया।

आज, जब मैं ये कहानी लिख रही हूँ, राजेश और मैं अभी भी एक-दूसरे के साथ हैं। हमारी कहानी उस ट्रेन की यात्रा से शुरू हुई, लेकिन कोलकाता की गलियों, पंडालों की रौनक, और ढाक की थाप ने हमें और करीब ला दिया। शायद प्यार अनजाने में, अनजानी जगहों पर मिलता है। मेरे लिए, वो जगह थी हावड़ा एक्सप्रेस की वो रात और दुर्गापूजा की वो चमकती रातें।

आपको ये कहानी कैसी लगी कमेंट करके अपनी राय जरूर दीजिये।

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नमस्ते, मैं तनीषा एक डिजिटल क्रिएटर जो जिंदगी को बिना किसी फिल्टर (Unfiltered) के जीने में यकीन रखती हूँ। खूबसूरती हो या करियर, रिश्ते हों या पैसा मैं हर चीज़ में परफेक्शन तलाशती हूँ। 'Dilsetanisha' के ज़रिये मैं आपके साथ शेयर कर रही हूँ अपने स्टाइल सीक्रेट्स, रिलेशनशिप एडवाइस और सफल होने के राज़।
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